Friday, October 26, 2018

करवाचौथ की आधुनिक कथा


बहुत समय पहले की बात है जब राक्षसों से भगवान की लड़ाई चल रही थी। भगवान अपने सारे अस्त्र शस्त्र लेकर जब युद्ध करने पहुंचे और उन्होंने कहा कि वो राक्षसों को उनके पापों का दंड देने आए हैं तो राक्षस ज़ोर ज़ोर से हंस दिए😂😂😂। और बोले की आप हमको मार ही नहीं सकते। भगवान को गुस्सा आया उन्होंने अपने धनुष पे बाण रख के चला दिया
लेकिन जाने कैसे बाण की दिशा हवा में ही बदल गई, राक्षसों पे कोई असर नहीं हुआ और वो और जोर से हंसने लगे 🤣🤣🤣। एक राक्षस बोला, अरे ये बच्चों के खिलोने हम पे कोई असर नहीं करने वाले, हमारे पास सुहागन है, ये वो एडवांस आटोमेटीक गन है, जिसके आगे तो AK47 की गोलियां भी फेल है ।🤣🤣🤣।
भगवान ने भी सोचा कि भाई बात तो सही है। भगवान ने तरकीब निकाली और अपने गुप्तचरो को भेज के राक्षसों की गन में जंग लगा दिया। इस बार जब भगवान ने  बाण चलाया तो सिधा छाती पे लगा और राक्षस खत्म हो गये। क्योंकि जंग लगी बंदुक से गोली निकली ही नहीं। 🤪🤪🤪
करवाचौथ का व्रत करने से आपकी ग्रेट गन सुहागन की सफाई हो जाती है, और उसमें जंग नहीं लगती।🤥🤥🤥
इतनी महान आटोमेटीक गन होते हुए भी अक्सर देखा गया है कि शादी शुदा पुरुष अकेलो के बराबर ही खुश रहते हैं क्योंकि ये ग्रेट गन डबल बैरल होती है, एक नली से गोली आपको बचाने निकलती है और एक नली से आपके तरफ।🤥🤥🤥

Tuesday, September 4, 2018

आओ कभी पतीली पे

कभी वीरान खंडहरों में रहा करने वाले भुतो के आजकल अच्छे दिन आ गए है और वो  आजकल हवेलियों पे रहने और बुलाने लगे हैंऐसे ही आधुनिक भूतो को समर्पित चन्द पंक्तियाँ


आओ कभी पतीली पे
   
    ओ तेरे संग यारा,
    मै लाइफ बनारा
    तू रात डरानी,
    मै मरघट सा सन्नाटा|
ओ मैने बदन पकाया हैं,
तुझे खाने पे जो बुलाया हैं,
तुझपे मरके ही,
तो मुझे भूत बनना आया हैं|
    ओ तेरे संग यारा,
    मै लाइफ बनारा
    तू रात डरानी,
    मै मरघट सा सन्नाटा|
ओ कितने पापड़ बेले,
ओ कितना पसीना बहाया;
तुझे मस्का लगाने के वास्ते,
मैने कितनो को टपकाया|

ओ तुझसे मिलने को,
मैने पार्टी का मूड बनाया;
ताज़ा शिकार का भी,
मैने जुगाड़ लगाया |
    ओ तेरे संग यारा,
    मै लाइफ बनारा;
    नरक से भी मुर्दे उठा आऊँ,

    जो तू करदे इशारा |

Saturday, September 6, 2014

गँजाई

(1) बाल झड़ने की शुरुवात :
मै और मेरे गिरते हुए बाल अक्सर ये बातें करते है; 
अगर तुम सिर पर होते तो कैसा होताऐसा होतावैसा होता।
तुम मेरे सर चढ़ के नाचते और मै अपने पंजो पर नाचता।
मै तुम्हे प्यार से सहलातातेल मालिश करता और तुम दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ते।
हवा चलती, तुम इठलाते बलखाते, और मेरे पैर जमीन पर  पड़ते।
हाय तुम मुझे यूँ गंजा छोड़ कहाँ चल दियें। 
मै और मेरे गिरते हुए बाल.……………

(2) बेतहाशा बाल झड़ना :
अब मुझे रात दिन बालो का ही ख़्याल है;  क्या कहूं गंजे सर का क्या हाल है;
इस गंजे को ये मलाल है, कि तुम्हारे सर पे बाल है।अब मुझे रात दिन............

बालो को बढ़ता देखे बिना चैन मिलता नहींतेल मालिश भी तो कोई अब चलता नहीं;
जादू
 हैं कैसाकी तेरा कोई बाल झड़ता नहीं उजड़ गया हूँइस गँजाई में | अब मुझे रात दिन .....

हद से बढ़ने लगा मेरा गंजापन; विग को लगा लूं ,के टोपी के निचे छुपा लूं;
या फिर हेयर ट्रांसप्लांट करा लूंक्या कहूं गंजे सर का क्या हाल है | अब मुझे रात दिन बालो का ही ख़्याल है। 

(3) लगभग पूरा गंजापन :
गँजाईगँजाईगँजाई ;  टेनशन का साथ क्या खूब निभाई।
जब से टकली देने लगी है दिखाई,  तेल मालिश भी कोई काम  आई। गँजाई ,गँजाई ,गँजाई।

आज नए इम्पोर्टेड तेल की शीशी है मंगाई ; कल ही नीम हकीमो ने थी बताई |
अब तक जो भी दवा है लगाईं ; उसने मेरी दुर्गती ही बनाई।
डूबी मेरी पाई पाईलूट ले गई गाढ़ी कमाई;  गँजाईगँजाईगँजाई 

(4) पूर्णतया बाल रहित :
गँजाई गँजाईटकली पे फैली हुई हैं गँजाई।
मैने जो किया कंडीशनर अप्लाई,  तो बालो की जड़े ही हाथो में आई। 
बालो के वास्ते टेबलेट्स मैंने कैसी कैसी खाई;  पर टूटे बाल सारेमायूसी है छाई। 
हर दवा, फ़ैल हुईजिंदगी उखड गई;  गँजाईगँजाई.....
क्या मैंने चाह था, और क्यों किस्मत मैं आई,  गँजाईगँजाईटकली पे फैली हुई हैं गँजाई। 

(5) हालातो से  समझौता 
बालो का टूटनाझड़ना और उखड़नाकोई मरहम ना इन्हे रोके।
मरहम मल्टीनेशनल कंपनीज़ के लिए हैमैंने कुछ ना पाया इन्हे अप्लाई करके।

Saturday, March 16, 2013

ईटली की तितली

ओ मंचिनीs, कहाँ उड़ चली,  झूठे डॉक्योंमेंटस पे मोहर लगा के कहाँ उड़ चली | ओ मंचिनीs

Wednesday, October 10, 2012

असुरदास पार्ट II

बहुत दिनों तक छाती पीटी, बहुत दिनों तक रह लिए उदास;
तोड़ के अपनी ग़म  की समाधी, लौट आये नीलम असुरदास।

चाहते न चाहते जीवन एक नई  करवट ले रहा है, हर चोट जीवन की दिशा धारा नहीं बदल सकती लेकिन जीवन का झरना बड़ी बाधाओ के आने पर , अपने नए रस्ते खुद बखुद बना लेता है, मेरा जीवन भी बदलता रह हैं और शायद आगे भी रहेगा, और अब मै  खुद को कविताओ के अधिक और अधिक  निकट पा रहा हूँ , शायद इस ब्लॉग पर मेरी लेखनी अब कम  चलेगी, क्योकि अब में अपने कविताओ और हास्य कविताओ के लिए बनाये गए ब्लॉग "फिश मार खां"(fish-mar-khan.blogspot.in) पर अधिक सक्रिय रहूँगा।
इस ब्लॉग पर भी कभी कभी कुछ पोस्ट डालने के प्रयास किया करूँगा, मेरी कई रचनाये इस ब्लॉग पर अधूरी ही पड़ी है, और वक्त आने पर उन्हें एडिट कर पोस्ट तो करूँगा ही, लेकिन इस समय विदाइ लेनी  ही होंगी ।

Sunday, September 16, 2012

विषेले स्वप्न,अँधेरी दुनिया


जब मनमित ना मिले, यूँ लगा की अरमानों के पंख जले;
जीवन तो जलाया था पहले, पर यूँ लगा की उजालो से मेरे प्राण जले|
संगीत तो कभी था ही नहीं, पर यूँ लगा की थम गई स्वर ध्वनि;
ह्रदय में न थी कोई कमजोरी, पर यूँ लगा की स्वच्छंद हुई हृदयगति|

Friday, June 29, 2012

मोम की व्यथा

मोम था मै, पर दुनिया ने सदा से मुझे पत्थर समझा,
पहले चोट पर चोट देकर मेरा बदन तराशा,
फिर जब बरसो तक जलकर मैंने नया जीवन पाया,
कोई संगदिल मुझे जूतों तले दबाकर ले गया,
और फिर से चोट खाने के लिए बिच सड़क पर छोड़ गया,
स्फटिक हिम सा श्वेत था मै, पर अब एक अपशिष्ट विकृति हूँ मै,
चाहे दुनिया मुझे पत्थर समझे, पर मोम था मै, मोम हूँ मै|
मुझ पर चोट करने वाले एक दिन थक जायेंगे,
पर हम नये सांचे में ढलकर नए रूप में फिर आयेंगे,
तब शायद दुनियां ये समझे, मोम था मैं, मोम हूँ मैं|

Thursday, May 10, 2012

विवाह क्यों?


जीवन  की सभी राहे अंत में ईश्वर या खुदा पर ही समाप्त होती है, लेकिन विवाह जीवन का एक ऐसा मोड लगता है जिसका आध्यात्मिक विकास से कोई लेना देना न हो| पर जाने क्यों अंदर से ऐसा भी  लगता रहता है की ये विकास का ही एक पड़ाव है, इसी तथ्य का विवेचन मेने इस पोस्ट में करने का प्रयास किया है| 
गौर से देखा जाय तो, कोई मूर्ति पर ध्यान लगाता है, कोई जीवन साथी पर, कोई ज्ञान पर, अंत में जब ध्यान की गहराई में मन शांत हो जाता है तो आत्मा की आवाज सुनाई देती है, और वही ईश्वर तक ले जाती है| लेकिन ध्यान लगाने के लिए जीवन साथी ही क्यों? कोई घनिष्ट मित्र क्यों नहीं?  
जीवन में जीवन साथी का वही भाग होता है जो एक ऐसे सच्चे दोस्त की तरह है जो तुम्हारे हमेशा साथ रहता हो, और जो तुम्हारी अंतरात्मा को साफ़ रख सकता हो| जीवन में  निरंतर ऐसी घटनाये होती ही रहती है जिनके चलते हमारी अंतरात्मा पर धुल/कालिख जमने लगती है, साथ ही हम अपनी ही आत्मा की आवाज़ को अनसुना  कर धीरे-२ स्वयं तो अंदर से बहरे हो जाते है और अंतरात्मा को गूंगा बना देते है| यदि हम स्वयं अंदर झाँकना बंद कर दे तो बड़े से बड़ा गुरु भी हमें ईश्वर तक नहीं पहुचा सकता| ऐसे में हमें ऐसा दोस्त चाहियें जो हमें इतना नज़दीक से जानता हो की वो हमारे अंदर झांक सकता हो , और ये काम एक जीवनसाथी के अलावा कोई नहीं कर सकता|
 दोस्त जो तुम्हारे साथ नहीं रहते धीरे-२ नए परिवेश में ढल जाते है, और परस्पर समझ धीरे-२ कम हो जाती है, परन्तु चाहे संतति के हित के लिए ही सही, विवाह के बाद साथ रहना ज़रुरी हो जाता हैं| संतान का जन्म एक प्रकृति प्रदत्त मुश्किल की घड़ी है जो शायद इसलिए बनाई ही गई है की आप एक दूसरे के बेहद करीब आ सके| साथ बिताए सुख के पल तो कुछ समय के बाद धुँधले पड़ जाते है लेकिन मुश्किल समय में दिया हुआ साथ आपको गहराई से जोड़ देता है| 
वही दूसरी तरफ से देखा जाय तो संतान  का जन्म स्वयं अपने आप में एक आध्यात्मिक घटना है, चाहे संतान का माता पिता की और प्रेम हो या माता पिता के  संतान के प्रति प्रेम और करुणा के भाव हो, ये प्रेम भाव भी तो मन/आत्मा के मेल को धोने की एक श्रेष्ठ औषधियाँ ही है| आप ईश्वर की सभी संतानों में अपनी संतान की छवि देख कर अपने समस्त बंधनों से मुक्त हो सकते है, या संसार के अन्य लोगो को माता पिता की भाँती आदर देकर परमपिता परमेश्वर को साक्षात महसूस कर सकते है| भक्ति ईश्वर को पुत्र/पुत्री , माता/पिता, या सखा/सहेली  देखकर की जा सकती है| और फिर यह सच ही है, आत्मा के रूप में ना तो इस संसार में आप ईश्वर के बाद आये है न उसके पहले, अत: यह तो आप पर निर्भर है की आप किस पर ध्यान लगाना अधिक स्वाभाविक और सहज मानते है|
कई बातें हम सब जानते है/समझते है, परन्तु उनका हमें कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता, यहाँ ये भी ध्यान देने योग्य है की अंतरात्मा के पास हर सवाल का जवाब है, फिर भी हम बार बार जन्म लेते है, क्योंकि जिसे सिर्फ जानते है, अनुभव नहीं कर पाते वो कागजी ज्ञान तो समय की धारा में बह जाता है| विवाह की पौधशाला हमें जीवन के अनुभव देने के लिए है, निश्छल प्रेम में डूबे, साफ़ अंतर्मन में बोलते ईश्वर की आवाज़ सुनाने के लिए है|

कर्मफल


कई बार घर के जब बच्चे आपस में झगड़ते है, तो घर में मा बाप बड़े बच्चे को समझाते है, बेटा छोटा तो नासमझ है तू तो समझदार है, मान जा छोटे की ही बात रख ले| यही भगवान राम ने सीता माता के साथ किया था, जब नासमझ प्रजा ने अयोध्या के राजसिहासन पर ऊँगली उठाई, सब को सुखी रखने के प्रयास में सीता माता के साथ अत्याचार हो गया| यहाँ से हमें एक बात ये भी सिखाने को मिलती है की दुनिया में बुरे लोग क्यों होते है, क्योंकि अच्छे लोग ज्ञानी और अज्ञानी, योग्य और अयोग्य में अंतर नहीं करते| कोई परिस्थितिवश अज्ञानी रह जाता है तो कोई जानबूझकर आलस्य से भरकर अज्ञानता का रास्ता अपनाता है, लेकिन एक अज्ञानी यदि दुखी है है तो एक भला मनुष्य उसका भी दुःख हरने का ही प्रयास करेगा| और एक तानाशाह उससे कहेगा की तुम अपना भला बुरा समझाने के योग्य नहीं हो, और अपने से छोटे लोगो में योग्यता अनुसार भेद करेगा| यहाँ ये भी समझाना जरुरी है की कर्मफल इसलिए नहीं होता की आपने सही या गलत राह चुनी, कर्मफल इसलिए होता है की आपकी वजह से औरो के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? आप अपनी राहें चुनने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन किसी और को चोट पहुचाने का आपको अज्ञानतावश भी कोई अधिकार नहीं है, मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती जब तक चोट खाने वाला आपको क्षमा नहीं कर देता।
 इसका अर्थ ये हैं की अज्ञानता में किये हुए अपराध की भी सजा होती हैं| कर्मफल से तो स्वयं श्रीराम भी नहीं बच पाए थे और बाली को छुप कर मारने पर उन्हें भी कृष्ण के रूप में शिकारी के हाथो मरना पडा था| संभवतया वो १६००० स्त्रियां जिन्हें कृष्ण ने नारकासुर से मुक्त कराया था, वो श्रीराम की ही अज्ञानी प्रजा थी, असुर द्वारा अपहरण होने पर अपरहित पर ही लांछन लगाने के लिए उन्हें अगले जन्म में स्वयं अपहरण का और अपमान का अनुभव करना पड़ा. यदि राम ने सीता माता का त्याग किया तो कृष्ण ने उन १६००० से विवाह कर ये भी स्थापित करने का प्रयास किया की अपहरण के लिए स्त्री को दोष न दिया जाय| लेकिन कालान्तर में हमने कृष्ण के आदर्श को भुला कर प्राचीन परिपाटी को पुनः अपना लिया, सच भी है लोकतन्त्र के इस युग में कडुवा पीना किसे अच्छा लगता है, जो ज्यादा लोक लुभावन वादे करे वही अच्छा है, अफ़सोस न तो नेता राम है न ही प्रजा राम को राजा बनाने को तैयार है| जबतक ज्ञान का प्रकाश हर ह्रदय तक नहीं पहुच जाता हमारे आलस्य के फल के रूप में हमें तानाशाह / स्वार्थपरक नेता मिलते रहेंगे, राम राज्य के स्वप्न देखने से पहले हमें अपने आस पास की सारी प्रजा को राम राज्य के योग्य ज्ञानी बनाना होगा|

Monday, April 23, 2012

साइबर युग के राधा कृष्ण


कल्पना कीजिये अगर राधा कृष्ण इस युग में जन्मे होते तो कैसे होते? कृष्ण अपनी गायों के गले में मोबाइल बाँध कर जंगल में छोड़ देते और जब वापिस बुलाना होता अपने कक्ष में बैठे बैठे ही बांसुरी बजा देते, मोबाइल पर बांसुरी की धुन सुनकर गायों को अपने कन्हैया की याद आती और वो खुद-ब-खुद वापिस चली आती| ऐसे ही गोप गोपिया नन्द बाबा के यहाँ कान्हा की बांसुरी की MP3 लेने के लिए लाइन लगाते की तुम्हारी धुन सुनके हमारी देशी गाय भी विदेशी गायों की तरह दूध देने लगती हैं| राधा, कृष्ण को ताने मारती की तुम्हारे फेसबुक अकाउंट पर बार बार कमेन्ट करने वाली ये चुड़ैल है कौन? कृष्ण कभी अपनी बांसुरी पर व्यस्त होते तो कभी लैपटॉप पर, आखिर गुस्सा हो कर राधा लैपटॉप छुपा देती और कृष्ण अपनी  मुरली पर तान देते
राधिका तुने लेपि चुराई, राधिका तुने लेपि चुराई
 काहे को तुने रार मचाई रे
ना इसकी मेमोरी तेरे आइपैड से बेहतर, ना स्क्रीन ही है बिगर
गेमिंग के लिए तुझे इसको करना पड़ेगा कॉन्फ़िगर, प्रोसेसर भी है इसका स्लोवर
काहे को तुने रार मचाई रे.......
राधिका तुने लेपी चुराई........   

Friday, February 3, 2012

भारतीय समाज की कम्युनिस्ट जड़े

कठोरतम  कम्युनिज्स्म एक ऐसी धारणा है जहाँ अपराधी और अपराध के शिकार को एक ही निगाहों से देखा जाता है, जैसे पैसे अधिक रखने वाला उससे बड़ा अपराधी है जो चोरी करता है, क्योंकि चोर को चोरी की जरुरत इसी लिए हुई, क्योंकि धनवान ने अपना धन नहीं बाटा! लेकिन फिर हमारा धर्म भी तो यही सिखाता है की न्याय करने का अधिकार सिर्फ भगवान को है , तो हम ये निर्धारित करने वाले कौन है की दोषी कौन है.
 इसी के चलते,  देखा जाए तो हमारा समाज भी स्त्री अपराध के लिए स्त्री को ही दोषी ठहराता आया है, शायद ऐसी सोच इस कुतर्क के चलते भी है की समाज के बनाए हुए सुरक्षा के नियमों का पालन नहीं करके, उस स्त्री ने अन्य स्त्रियों को नियमों का उल्लंघन करने के लिए उकसाया है!  
यहाँ तक की गर्भपात की शिकार महिलाओ को भी कई तरह की सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाती  है, मानो अपने बच्चे को खोने की उन्हें कोई पिडा नहीं थी, जो उन्हें और पीड़ित करने पर समाज उतारू हो गया?
लेकिन समाज में गहरे से धसा कम्युनिस्म का जबड़ा सिर्फ महिलाओं को डसने/निगलने तक सिमित नहीं है, मेरी तरह तलाक पीडित समाज के कई कार्यों में भाग लेने का अधिकार नहीं रखते है क्योंकि मैंने एक पवित्रम वादा तोडा है, अग्नि और अन्य समस्त देवताओं के सामने लिए हुए वादे को तोडना एक बहुत बड़ा अपराध है, इस्से आगे समाज को इससे कोई सरोकार नहीं होता की इस वादे में वादाखिलाफी आखिर किसने की? तलाक के लिए भूतपुर्व पति और पत्नी दोनों बराबर के दोषी ठहराये जाते है. 
मेरी नजर में अपराध के शिकार और अपराधी को बराबर की दृष्टि से देखना, अपने आप में एक अपराध है,  लेकिन पता नहीं कब समाज/भगवान हमारी सुनवाई करेगा? हमारे समाज में कम्युनिस्ट जड़े बहुँत गहरे से समाई है, २० वि सदी के चीन और हमारे समाज में अंतर केवल इतना है की वोह भगवान को ना मानकर न्याय की जरुरत नहीं समझते थे/है  और हम भगवान को मानकर न्याय की जरुरत नहीं समझते.

दिग्गी राजा की दुनिया से साभार..............

तसलीमा नसरीन और सलमान रुश्दी को बोलने की अनुमति नहीं देने वाला भ्रष्ट तंत्र ये मान चूका था  की स्वामी बडबोलापन दिखा कर राजनितिक आत्महत्या कर चुके है और अब जो बचा है वो उनका भुत/भूतकाल  है. वहि दूसरी तरफ सडगल चूका हमारा अपराधिक प्रवृति को शरण देने वाला सरकारी तंत्र मृतप्राय हो चूका है. ऐसे मृत तंत्र में खलबली मचा देने वाला सुप्रीम कोर्ट एक ओझा के समान है, और इन्ही को मेरा यह पहला कार्टून समर्पित है

भारत में लोकतंत्र की कबर खुद गई है ?????

Monday, January 2, 2012

Mercy के मालिक श्रीयुत निलम असुरदास के दोहे


निलम गावत देखके मेलोडीज करी पुकार;
बहुत हो गया तोहरा बेसुरा आयटम सोंग, कब आएगी हमारी बार |



निलम कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय
या खावै अकेला बोराय, वा गावै सैकड़ो बोराय |


निलम-नीलाम गुलाम ते दो कौड़ी भी अधिक नाय;
या रोवै भीख में लोग माल दई जाय;  वा गावै माल छोड़ी के लोग भागी जाय |

Sunday, December 18, 2011

deja vu

ये कौन सा मोड़ है रिसर्च कैरिएर का; मख्खी, अंडे और ढेर सारी मछलियाँ;
सबमे बनाने है मुझे निओपिलासिया; पर पहले जैसी स्कील्स अब मेरी है कहाँ;
कैंसर जेनेटिक्स अब मुझे लगता है जैसे पहेलियाँ; फिश कट जाती है, पर कैसे मुझसे कटेगी ये मख्खियाँ,
किस्से कहू में ये सारी बतियाँ, ये कौन सा मोड़ है रिसर्च कैरिएर का..................

Thursday, October 6, 2011

डॉगविजय एंड कंपनी एड

पहले देखियें फिर गुनगुनाइए

ऊँची अपनी टांग है, करनी बात उटपटांग है,   ब्लेडर में अटकी जान है.
यहाँ पिलर  है बनानी, मिलता इससे सुकून है रूहानी !

(रचना इस वर्ष के Ig Nobel से प्रभावित है )

Wednesday, September 28, 2011

समानता-विडम्बना

क्या कभी आपने सोचा है की पाकिस्तानी क्रिकेटरों और हिन्दुस्तानी नेताओ के बिच, क्या समानता है? दोनों जगह भुतपूर्व क्रिकेटर नेता बन जाते है लेकिन यहाँ हम उनकी बात नहीं कर रहे है, बल्कि क्रिकेटरों से प्रेरित राजनीती की बात कर रहे है,
बयान:
(१)  मैं सभी तरह के क्रिकेट से संन्यास लेता हूँ

कुछ महीने बाद: मेने काफी सोच विचार किया और मेरे टीम के सदस्यों की सलाह से इस नतीजे पर पहुचा की मुझमे अभी बहुत क्रिकेट बाकी है और मैं अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में चयन के लिए उपलब्ध हूँ
(१’) मैंने अन्तरात्मा की आवाज पे पार्टी/पद से इस्तीफा दे दिया है

कुछ महीने बाद: जनता और मित्रों के अनुरोध पर मैं देश हित में अपना इस्तीफा वापिस लेता हूँ

आरोप:
(२) बाल टेम्परिंग:

बेशर्मी: इस तरह से गेंद के साथ हुई छेड़छाड़ को कानून बनाकर वैध बनाया जाय, इससे क्रिकेट का विकास होंगा. पूरी गेंद के साथ खेलने से क्रिकेट बोरिंग/नीरस हो जाएगा  

(२’) बिल टेम्परिंग:

बेशर्मी: इस बिल को जल्द से जल्द कानून बनाया जाय, हमने बिल में आवश्यक परिवर्तन कर लोकतंत्र को मजबूत बनाया है. पूर्ण बिल को स्वीकार करने से सविधान का अपमान होंगा.
रिश्वतखोरी
(३) नो बाल के लिए डॉलर्स: कौन सी बाल कैसी डालना है यह सब आपके पैसो पर निर्भर करेगा
(३’) नो कॉन्फिडेंस मोशन के लिए डॉलर्स: कौन से प्रस्ताव पर कैसे मत देना है ये आपके पैसो पर निर्भर करेगा.

निष्कर्ष: मलिक, सामी, आसिफ, आमेर, अख्तर, आफरीदी आदि पाक खिलाडियों को भारत रत्न दिया जाए इन्होने भारतीय लोकतंत्र की बड़ी सेवा की है.

Friday, September 23, 2011

समसामयिक

ND तीवारी की कोर्ट ने अच्छी खिचाई की, पर मुझे लगता है की अगर उनका ब्लड सेम्पल मिल जाता तो कई कोठे पर बैठी तवायफ़ों के बच्चो को बाप मिल जाता. आखिर ये अनैतिक व्यक्ति आंध्र राजभवन में ३ तिन कॉलगर्ल्स के साथ पाया गया था, अगर ८५ साल की उम्र में इनका यह हाल था तो उत्ताराखंड के मुख्यमंत्री रहतें हुए तो उन्होंने गजब ढाया होंगा, बस एक बार के ब्लड सेम्पल से ही हजारों टेस्ट लग सकते थे.
 सावन के अंधे, जिन्हें सब हरा ही हरा नजर आता है
India busy on Idea 3G , so no आबादी; government busy on camouflaging 2G , so no गरीबी.
हा हा अब तो मेरा हिन्दुस्तान प्रगति पथ पर है.
विजन २०२०:
२००५ :जो दो वक्त का खाना न खा सके वो गरीब
२०११: जो एक वक्त का खाना खा सके वो गरीब नहीं,
२०१२:जो किसी सरकार विरोधी आन्दोलन में हिस्सा ले वो गरीब नहीं
अन्ना के आन्दोलन का खर्चा सरकार ने तो उठाया नहीं, वो तो आन्दोलन करने वालो ने खुद उठाया. अब जिनके पास इस तरह के आन्दोलन में खर्च करने को पैसा है वोह गरीब कैसे हो सकते है?
२०१५ :जिसके पास हो बैंक में खाता वोह गरीब नहीं,
सरकार छात्रो के जीरो बलेंस खाते खुला रही है, गणवेश की  सब्सिडी देने के नाम पर, कल कहेगी सब्सिडी दी पढाई हो गई अब कैसी गरीबी? खाता है, मतलब जरुरत से ज्यादा पैसे है, तो फिर गरीब कैसे?
२०२०:  जो दिन में एक बार मोबाइल फोन से बात करे वो गरीब नहीं कहलायेगा.
 मोबाइल टैरिफ वार में एक दिन सब के पास मोबाइल पहुच जाएगा और फिर दिन के एक कॉल का खर्चा सरकार सब्सिडी के रूप में देंगी, और एक कॉल मोबाइल कंपनी फ्री देंगी. सरकार  कहेगी की जो इन दोनों काल्स का उपयोग  करेगा उसे गरीब नहीं माना जाएगा! क्योंकि गरीब होगा तो उसके पास बात करने की फुर्सत कहाँ से आई?

यह है सरकार का विजन २०२०. २०२० में गरीबी एकदम ख़तम.